Monday, June 1, 2009

ये क्या हुआ है मुझे !!!

पल पल की खुशी को जीना चाहती हू आज कल

हर एक लम्हे को मै छूना चाहती हू आजकल

पता नही क्यो खुशी दिखती है हर बात में

पता नही क्यो एक उमंग सी छाई है आजकल

क्यो ? मै सदियों को लम्हों में जीना चाहती हू

क्यो मै आज कल बस ख़ुद में खोना चाहती हू

कही ये मेरा कोई सपना तो नही !

कही मै नींद में तो नही ,

ये सवाल जेहन में लाके क्यो रुक जाती हू

ये मुझे क्या हुआ है क्यो समझ नही पाती हू

पर शायद मै समझना भी नही चाहती

क्यो !!!

2 comments:

MAYUR said...

खुश रहिए , कैसे भी , बस खुश रहिए , अच्छा लिखा है आपने
सधन्यवाद,
मयूर
अपनी अपनी डगर

रितेश चौधरी said...

सबको सफ़र चुनने की आज़ादी नहीं मिलती
मंजिलें मिल भी जायें मगर कामयाबी नहीं मिलती
आवारा परिंदों की तरह उड़ जाता है वक़्त दूर कहीं
पर जाने क्यों हमें अपने गुज़रे हुए कल से आज़ादी नहीं मिलती
दिल की तिजोरी में बंद कर के रखे थे खुशियों के चाँद लम्हे
एक मुद्दत हुई उस तिजोरी की चाभी नहीं मिलती
बेझिझक किसी बच्चे की तरह घुस गया थ किसी गैर के घर में
क्या खबर थी की बड़ों को बच्चों सी आज़ादी नहीं मिलती
साहिलों पर बिखरी रेत से इस संसार में क़दमों के निशाँ तो बहुत मिलते हैं
पर किसी भी निशाँ को पहचान बेमियादी नहीं मिलती
कभी मौका मिला तो लिखूंगा तेरे बारे में भी
अभी तो ख़ुद से फुर्सत नहीं मिलती
मिलने को तो मिल जाती है हर चीज़ जिन्दगी में
बस जिनकी चाहत होती है वही नहीं मिलती
मिल जाती है आज भी बहुतों से नज़रें
पर हजारों में भी वो एक नज़र नहीं मिलती
इस कदर बेकरार है तेरे फ़िर आने की आस में ये दिल
कि किसी आलम भी रग्बत नहीं मिलती
नाहक ही परेशान है तू ए दिल
जबकि मालूम है तुझे
कि हर किसी को इस जहाँ में
मोह्हबत नहीं मिलती
झूठ कहा था मैंने भी- उसने भी
क्या खबर थी कि झूठ के पुलिंदों में
असलियत नहीं मिलती
आज बरसों बाद मिलकर समझा रहे हैं वो
इश्क का मतलब हमें
ज़रा पहले कह दिया होता
तो इतनी मुसीबत नहीं मिलती
जो समझते थे कि
समझते हैं सब कुछ हम
अब समझ में आया
कि दीवानों को कुछ भी समझने की
समझ नहीं मिलती
वक़्त अभी मोड़ पर ही है
सोचता हूँ वापस बुला लूँ
पर आवाज़ में अब वो पहले सी
ताक़त नहीं मिलती
याद कर के बीते लम्हों को
खुश तो हो सकता हूँ मगर
जिन्दगी की जद्दोजहद में फुर्सत नहीं मिलती
दोस्त बनने को तो आज भी तैयार हैं कई लोग
पर अब किसी से भी अपनी तबीयत नहीं मिलती
जज़्बात भी वही हैं
अल्फाज़ भी वही हैं
पर अब किसी भी जुबान में
तुझ सी मासूमियत नहीं मिलती
फिसल जाती है हाथ से जिन्दगी यूँ ही बिन बताये
वक़्त बहुत बेरहम है
इससे एक पल की भी मोहलत नहीं मिलती
कर के देख ली है बहुत जोर-आजमाइश हमने
अब रिश्तों में पड़ी सिलवटें मिटाने की हिम्मत नहीं मिलती
दोस्तों ने इस कदर साथ दिया है हर मोड़ पर कि
अब हमें दुश्मन बनाने कि जरूरत नहीं पड़ती
मुस्कराहटों के हर पल कर संजो के रख लेना यारों
जिन्दगी में बार-बार मुस्कराने की मोहलत नहीं मिलती
ज़ख्मों का हिसाब मत रखना क्योंकि
अपनों की दी हुई चीज़ों की कीमत नहीं लगती
मुश्किलें हल हल हो जाएँगी सारी
गर सच को सच मान लिया जाये पर जाने क्यों
सच को सच मान लेने की हिम्मत नहीं मिलती
देखकल गलियों में फिरते इन आवारा आशिकों को भी
जाने क्यों इन नए मजनुओं को नसीहत नहीं मिलती
चलो अब लौट चलें घर की ओर
जिन्दगी की इन वीरान गलियों में अब
सांस लेने की भी आज़ादी नहीं मिलती
जो देते हैं दुहाई यार की बेवफाई की
कभी झाँक कर देखेंगे अपने गिरेबाँ में तो जान जायेंगे
वफ़ा के बदले कभी बेवफाई नहीं मिलती